आप का दिल्ली मॉडल उत्तराखंड में नहीं है प्रासंगिक

आप का दिल्ली मॉडल उत्तराखंड में नहीं है प्रासंगिक
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देहरादून: उत्तराखंड में आजकल आम आदमी पार्टी के चुनाव लड़ने की चर्चा हो रही है। शोसल मीडिया में यह मु्द्दा जोरशोर से छा रहा है। लेकिन आम आदमी पार्टी जिसका कि उत्तराखंड में मजबूत संगठन और लोकप्रिय नेता तक नहीं है वह आगामी विधानसभा चुनावों में किस तरह उत्तराखंड की बड़ी पार्टियों बीजेपी और कॉंग्रेस से टक्कर ले पाएगी? बात पिछले चुनावों की करें तो लोकसभा और निकाय चुनावों में आम आदमी पार्टी को कोई खास प्रदर्शन भी नहीं कर पाई। दरअसल उत्तराखंड में क्षेत्रीय पार्टी पर लोग आसानी से भरोसा करते नहीं हैं। इसकी तस्दीक यहां के राजनीतिक इतिहास से होती है।
राज्य गठन की लड़ाई लड़ने वाले दल को ही कर दिया किनारे
उत्तराखंड का मतदाता पारंपरिक रुप से भाजपा और कांग्रेस में ही अपना भविष्य देखता है। राज्य के गठन की लड़ाई लड़ने वाले यूकेडी की राज्य बनने के बाद 2002 में हुए पहले विधानसभा चुनावों में मात्र 4 सीटें आईं जो 200 में 3, 2012 में 1 और 2017 में शून्य हो गईं। ऐसी ही कुछ हाल बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का भी हुआ। 2002 में 8 सीट लाने वाली बसपा , बाद में 3 व फिर शून्य पर सिमट कर रह गयी समाजवादी पार्टी   (सपा) कोई सीट हासिल नहीं हुई। तब से अबतक कांग्रेस और भाजपा ही अपनी सरकार बनाते आ रहे हैं।
दिल्ली मॉडल उत्तराखंड में नहीं चल सकता
आमआदमी पार्टी उत्तराखंड में दिल्ली मॉडल के भरोसे आगे बढ़ रही है जबकि यहां की भौगोलिक परिस्थितियां दिल्ली मॉडल के अनुकूल नहीं हैं। न तो दिल्ली की तरह यहां शहरीकरण है और न ही लोगों की सिर्फ मुफ्त आधारित मुद्दे ही कारगर हैं। दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल के भरोसे उत्तराखंड में अपनी सियासी जमीम तलाशना उत्तराखंड में किसी फतांसी कहानी सा लगता है क्योंकि केजरीवाल उत्तराखंड के बारे में दिल्ली में रह रहे प्रवासी पहाड़वासियों के मुंह से सुने हुए से ज्यादा जानते हौं ऐसा लगता नहीं है।
एक सर्वमान्य नेता तक नहीं खोज पाई आप अब तक
उत्तराखंड में सियासी जमीन खोजने वाली आप अब तक एक ऐसा नेता भी नहीं स्थापित कर पाई जिसकी प्रदेशव्यापी पहचान हो। जो संगठन अब तक है उसमें भी इतनी फूट कि पूछो मत। जब तक पहाड़ को जानेंगे नहीं, पहचानेंगे नहीं तब तक चुनाव में उतरने की बात उत्तराखंड के भले से ज्यादा सियासी महत्वाकांक्षा ज्यादा लगती है।
गोवा का उदाहरण है सामने
आम आदमी पार्टी की सफलता उत्तराखँड में सफलता इसलिए भी संदिग्ध है क्योंकि गोवा जैसे छोटे से राज्य में 2017 में हुए विस चुनावों में आप  खाता तक नही खोल सकी। जबकि पार्टी यहां सरकार बनाने का दावा कर रही थी। वहीं पंजाब में भी मुख्य विपक्षी दल ही बन पाई जबकि तब राष्ट्रीय मीडिया तक में आप की जीत के पुरजोर दावे किए जा रहे थे।