इसलिए उत्तराखंड के लिए जरूरी नहीं बेहद जरूरी है त्रिवेन्द्र!
देहरादून: आंदोलनों और शहादतों के बाद बना उत्तराखंड इस कदर राजनीति के दुष्चक्र का शिकार बनेगा शायद ही किसी ने कल्पना की होगी। राज्य के गठन के साथ ही शुरु हुई राजनीतिक अस्थिरता के स्व. एनडी तिवारी के बाद जाकर 2017 में रुकी। लेकिन इस प्रदेश के शत्रु समान कुछ राजनीतिज्ञों और प्रोपगैंडा फैलाकर राजनीतिक हित साधने वालों को यह बर्दाश्त नहीं होता। इसीलिए तो सरकार बनी नहीं कि खबर फैलानी शुरु कर देते हैं कि सीएम हटने वाले हैं। लेकिन 2017 में प्रचंड बहुमत से बनी त्रिवेन्द्र सिंह रावत सरकार ने जमकर इससे न केवल मुकाबला किया बल्कि भ्रष्टाचार रहित स्थिर सरकार भी दी है। बड़ी बात यह भी है कि इस स्थिरता के लिए त्रिवेन्द्र सरकार ने एनडी तिवारी सरकार की तरह राज्य के संसाधनों का बेजा इस्तेमाल नहीं किया। अब तक के साढ़े तीन साल के कार्यकाल में न केवल उत्तराखंड को पटरी पर लाने की कोशिस की बल्कि बेदाग कार्यकाल की मिसाल भी पेश की। उत्तराखंड सरकार के खोए और नीलाम हुए इकबाल को फिर से स्थापित किया। मुख्यमंत्री का पद जो पद पिछली सरकार में कथित खरीद-फरोख्त का चेहरा हो गया था उसे फिर से वह गरिमा दी जो उसकी होनी चाहिए थी। दलालों और ब्लेकमेलरों का सख्ती से दमन किया गया और राज्य सचिवालय को भ्रष्टाचार और दलाल और ट्रांसफर पोस्टिंग के अड्डे से मुक्त किया गया। अभी भी इस सरकार का डेढ़ साल का कार्यकाल बाकी है और अभी और भी बेहतर छाप त्रिवेन्द्र सरकार छोड़ेगी इसकी उम्नीद की जानी चाहिए।
अफवाहें हैं अफवाहों का क्या है..
जैसा कि उत्तराखंड के विघ्नसंतोषियों का काम ही है सीएम त्रिवेन्द्र के सत्ता में बैठने के 6 माह से ही उनके हटने की अफवाहें शुरु हो गईं लेकिन उन्होंने हरबार खुद को साबित किया और इनसे कभी विचलित नहीं हुए। इन दिनों फिर यही हो रहा है लेकिन लोगों को यह समझना चाहिए कि स्थिरता से जो डबल इंजन की सरकार चल रही है उसे पार्टी आखिर क्यों हटाएगी? हो सकता है कुछेक विधायकों की मनमानी न चल पा रही हो और वह नाराज हों लेकिन यह तो बड़े बहुमत की सरकार में होना लाजिमी है। इस पर कोई भी पार्टी अपनी सफलता से चल रही सरकार को क्यों अस्थिर करेगी। और एक बात कि यह उत्तराखंड में पहली बार तो नहीं हो रहा कि अफवाह उड़ रही हो कि सीएम बदले जाएंगे। दरअसल उत्तराखंड में अफवाह फैलाने का तंत्र इतना प्रबल है कि जब मर्जी अफवाह फैला लो। दरअसल संसाधन संपन्न उत्तराखंड को माफियाओं का झुंड एक ऐसे उपनिवेश की ओर देखता है जो सिर्फ लूटने के लिए बना है। इसलिए इस तरह उत्तराखंड की सियासी फिजा में इस तरह की खबरें तैरती रहती हैं।
उत्तराखंड की जनता की भी बनती है जिम्मेदारी
उत्तराखंड की जनता यह बेहतर जानती है कि उत्तराखंड का गठन क्यों हुआ है। वह जानती है कि उत्तराखंड को लूट का अड्डा बनने से रोकना है। जब एक स्थिर और भ्रष्टाचारमुक्त सरकार चल रही है तो उसे अस्थिर करने वालों को जवाब देना जरुरी है क्योंकि सरकार का कार्यकाल 5 साल के लिए तय है यदि किसी सरकार का काम बेहतर न लगे तो उसे बदलने का अवसर मिलना ही है। इसलिए राज्य के हित के लिए इस तरह की अफवाहों पर विचार न करके इसे अपने हित की तुष्टि न करवा पाने वालों, उत्तराखंड को गिरवी रखने वालों का रुदन समझा जाना चाहिए।
विकास प्रकियाओं की भ्रूण हत्या है राजनीतिक अस्थिरता
राज्य में जब भी नेतृत्व परिवर्तन की अफवाह उड़ती है तो यह मात्र अफवाह नहीं होती बल्कि इसके भयानक परिणाम होते हैं। यूं समझिए यह विकास प्रकियाओं की भ्रूण हत्या के समान है। ऐसा क्यों है? दरअसल सरकार का राजनीतिक नेतृत्व राज्य के विकास के लिए लगातार नई योजनाओं, कार्यक्रमों को तैयार कर लागू करते रहते हैं लेकिन जब इस तरह की अफवाह उड़ती है तो इन कार्यक्रमों को धरातन पर उतारने वाली नौकरशाही सुस्त और लापरवाह हो जाती है जिसका परिणाम यह होता है कि योजनाएं और कार्यक्रम विफल हो जाते हैं। इसका न केवल सरकार पर वित्तीय भार पड़ता है बल्कि योजनाएं और कार्यक्रम विफल हो जाते है या फिर अपने लक्ष्य नहीं हासिप कर पाते हैं। अंतत: इसका खामियाजा प्रदेश की आम जनता को भुगतना पड़ता है।
वर्तमान हालात में जरुरी नहीं बेहद जरुरी हैं सीएम त्रिवेन्द्र
20 साल के उत्तराखंड के ये साल कैसे बीते ये कहने की जरुरत नहीं है लेकिन अब इसे एक सफल राज्य बनाना है तो एक सख्त प्रशासक की जरुरत है जो भ्रष्टाचार और दलाली के अड्डे को खत्म कर सके, और यह करने में सीएम त्रिवेन्द्र ने पिछले साढ़े तीन साल में साबित कर दिखाया है। आखिर हम कैसे कह रहे हैं उसके लिए सीएम त्रिवेन्द्र मार्च 2017 में सत्ता संभालने के बाद से बदली परिस्थितियों को देखकर आप भी यही कहने लगेंगे।
वो भीड़ कहां गई?
सीएम आवास और सचिवालय से अनावश्यक भीड़ को समाप्त किया। भले ही इसके लिए कई अपने प्रिय, परिचितों की नाराजगी मोल ली हो। अब बिना किसी काम के आवास, ऑफिस में भीड़ नजर नहीं आती। इसे उनके विरोधी उनकी कम लोकप्रियता बता कर दुष्प्रचारित करते हैं। जबकि यही लोग पूर्व सीएम के यहां लगने वाली इसी भीड़ को मच्छी बाजार की भीड़ करार देते रहे। आज ये भीड़ सचिवालय परिसर तक गायब है। अब अनुभागों और सचिव कार्यालयों में फाइल के पीछे भागते सफेदपोशों और लॉबिस्टों की भीड़ नजर नहीं आती। अनुभाग से लेकर सचिवालय के हर पटल पर कर्मचारी राहत में हैं। सीएम सचिवालय में आज एक भी ऐसा ओएसडी आपको नजर आता है, जिसके कहने भर से अफसर उसकी बात मान काम कर दे।
कहां गए वो जलवाधारी?
पूर्व मुख्यमंत्रियों के समय जो जलवा आर्येंद्र शर्मा, पीके सारंगी, द्विवेदी, साकेत, रंजीत रावत, राजीव जैन, राकेश शर्मा का था, क्या आज वो बात धीरेंद्र, खुल्बे, उर्बा दत्त समेत किसी दूसरे में है। नौकरशाही में भले ही ओमप्रकाश, राधिका झा, केएस पंवार के असर की बात की जाती हो, लेकिन वो तेवर और असर यहां भी नजर नहीं आते। आज हर किसी ओएसडी, सलाहकार, नौकरशाह की एक सीमा है और एक दायरा।
डीएम एसएसपी कमीशन लेकर नहीं बनते अब
आज डीएम, एसएसपी, डीएफओ, सीएमओ नेताओं की पसंद से नहीं, बल्कि सिर्फ और सिर्फ सीएम की पसंद से चुने जाते हैं। आज बात बात पर डीएम, एसएसपी, एसडीएम, तहसीलदार, थाने चौकियों में लोगों का तबादला करवाने वाले अब बेअसर हैं। आज सी रविशंकर, वी षणमुगम, विजय जोगदंडे, रंजना, नीरज खैरवाल, स्वाति भदौरिया, नीतिन भदौरिया जैसे अफसरों को भी कलेक्टर बना दिया जाता है। ऐसा सामान्य परिस्थितियों में आप कल्पना कर सकते हैं। पहले जहां एक डीएम का कार्यकाल साल भर हो जाता था, तो उसे रिकॉर्ड मानते हुए उनकी विदाई की तैयारी हो जाती थी। आज डीएम को पूछना पड़ रहा है कि साहब हमें वापस बुलाना भूल तो नहीं गए।
तबादला कभी उद्योग होता था
जिस तबादला एक्ट को सख्त जनरल बीसी खंडूडी शत प्रतिशत लागू नहीं करा पाए, वो त्रिवेंद्र सरकार में लागू हुआ। इसके आने से तबादला उद्योग चलाने वाले बेरोजगार हैं। इसी बेरोजगारी से मीडिया के उन रसूखदार लोगों को भी जूझना पड़ रहा है, जिनकी एंट्री पिछली सरकारों में चौथे तल से लेकर सीएम आवास में बेडरूम तक थी। आज बेडरूम तो दूर वेटिंग रूम तक ये भीड़ नजर नहीं आती। आप उम्मीद कर सकते हैं कि हर सरकार में हमेशा चौथे तल पर रहने वाला मृत्युंजय मिश्रा जैसा शख्स आज जेल की सलाखों के पीछे हो।
अपनी संस्थाएं पनप रहीं हैं
यूपी निर्माण निगम अपनी दुकान समेट रहा हो, ब्रिडकुल जैसी राज्य की कार्यदायी संस्था आगे बढ़ रही हो। जल निगम जैसे संस्थान को दिल्ली में उत्तराखंड निवास का 90 करोड़ का काम आवंटित हो। बड़े छोटे निर्माण कार्यों में रिवाइज इस्टीमेट के नाम पर दुकान चलाने वालों के शटर डाउन है। आज रिवाइज इस्टीमेट तो दूर तय लागत से भी कम में काम हो रहे हैं। डॉटकाली टनल, अजबपुर, मोहकमपुर फ्लाईओवर लागत से भी कम में तैयार हुए। देहरादून और हल्द्वानी के पेयजल संकट को दूर करने को जिस सौंग बांध और जमरानी बांध पर किसी सीएम ने हाथ डालने की हिम्मत न की हो, उस पर काम शुरू करा दिया हो। बल्कि सूर्यधार झील समेत राज्य में कई नई झीलों पर काम शुरू होने के साथ ही खत्म होने की कगार पर है। टिहरी में हर सरकार के गले की फांस बनने वाले डोबरा चांठी पुल का निर्माण पूरा हो चुका है। अटल आयुष्मान जैसी हेल्थ स्कीम को शुरू करा कर जनता को बड़ी राहत पहुंचाई गई। स्वास्थ्य सेक्टर में डॉक्टरों के खाली पदों को बड़ी संख्या में भरवाया। सहकारिता जैसे विभाग, जहां हमेशा घपले घोटाले के ही किस्से मीडिया की सुर्खियां बनते थे, आज वहां 3500 करोड़ की एनसीडीसी परियोजना शुरू कराई। अब दूसरे राज्य भी इसी मॉडल पर काम कर रहे हैं।
देवस्थानम बोर्ड गठन जैसा साहसिक फैसला, जिसे लेने में दिग्गज एनडी तिवारी तक पीछे हट गए थे, उसे तमाम दबावों के बावजूद न सिर्फ लिया, बल्कि लागू कराया। इसके बाद भी अस्थिरता फैलाने वाले बाज नहीं आ रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्रियों की तरह इस बार भी सीएम की कुर्सी हिलाने को मदारी गैंग बेताब है। जबकि मार्च 2017 से लेकर आज तक हुए सभी छोटे बड़े चुनाव में भाजपा ने जीत दर्ज की। अभी तक के कार्यकाल में सरकार के ऊपर किसी घोटाले तक का दाग नहीं है। सरकार के स्तर पर कुछ कमियां भी हैं। लेकिन वो ऐसी हैं, जिसका नुकसान राज्य की बजाय सीएम को स्वयं व्यक्तिगत स्तर पर उठाना पड़ रहा है। उनके पास अपनी टीम में वो मजबूत चेहरे नहीं है, जैसे पुराने सीएम के पास रही। हालांकि जो चेहरे हैं, वो काबिल न सही, लेकिन उन पर दाग भी नहीं हैं। नौकरशाही के कुछ धड़े जरूर जरूरत से ज्यादा हावी है। लेकिन भ्रष्टाचार की हिम्मत उनकी भी नहीं है।